आधुनिक मनोविज्ञान की मोलिक त्रुटी मानवीय चेतना की अधूरी समझ है| इसी कारण व्यकीतित्व उपचार सम्बन्धी प्रयास एक सीमा तक ही आगे बढ़ पते हैं और जहाँ प्रशन इसके आत्यंतिक उपचार एवं समग्र विकास का हो तो वहां आधुनिक मनोविज्ञान चुप्पी साध लेता है | वस्तुतः यह मानवीय चेतना की समग्र समझ के आधार पर ही सम्भव हे |
मनोव्यक्तित्व उपचार की समग्रता के सन्दर्भ में चेतना के आधार (आत्मा) को भुला देना ही आधुनिक मनोविज्ञान की सबसे बड़ी भूल है और इसी भूल के कारण वह अपने लक्ष्य से दूर अन्यत्र पहुँच गया है | अन्तः चेतना (INNERSELF) की सत्ता का अध्ययन इसका प्रमुख विषय होना आवश्यक है |
मनोचिकित्सक अपने मरीजों का मनोकायिक स्तर पर ही संतुलन बिठा पते हैं इससे आगे उनकी पहुँच नही हो पाती आधुनिक मनोविज्ञानिक विधियों की अपनी सीमाएं हैं जिनके द्वारा व्यकतित्व विकारों को एक सीमा तक ही ठीक किया जा सकता हे | किंतु इसका सर्वांग उपचार यहाँ सम्भव है |इसलिए जीवन को आत्मकेंद्रित (SELF CENTERED)बनाये बिना किसी भी व्यकतित्व के बिखराव की परिसमाप्ति नही हो सकती | वस्तुतः व्यक्तित्वअखंडित बना पाना मानसिक स्तर से गहेरे जाने पर ही सम्भव हे आत्मिक सत्ता द्वारा ही सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान हो सकता है | इस तरह PSCYCOSPIRITUALISM सुपर चेतन को व्यक्तित्व का आधार मानते हुए व्यक्तित्व के समग्र विकास की ठोस पृष्ठभूमि
