Saturday, April 10, 2010

...आवाहन बन गई आरती,................






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mukesh mishra

show details 10:24 am

आवाहन बन गई आरती,
यह कैसी मर्जी है तेरी!
मेरे बिखरे और अधूरे,
जीवन का बोलो क्या होगा !!
परिचय पूरा हो न सका था,
और विदा का छड़ आ पहुंचा !
केवल आँखों की भाषा से,
आमंत्रण ही पढ़ पाया था !!
अस्त -व्यस्त हो गईं सीड़ियाँ,
कुछ सीड़ी ही चढ़ पाया था!
मात्र भूमिका लिखी गई थी,
समय लेखनी छुड़ा ले गया !
मेरी मधुर कल्पनाओं के ,
इस बचपन का बोलो क्या होगा !!
आलिंगन को हाथ बढे थे ,
पर सूरज का रथ आ पहुंचा !
और समय ने घंटी दे दी ,
अपना-अपना पथ आ पहुंचा !!
कैसा मिलन कि जिसमे बिछुड़न,
का प्रस्ताव रखा था पहले !
उपन्यास यह कैसा जिसमे,
उपसंहार लिखा था पहले !!
कुछ कहने को अधर खुले थे ,
हवा ले गई शव्द सुहाने !
मन की अनव्याहीं खुशियों के,
कुंजन का बोलो क्या होगा !!
मुझे भरोषा था,कुछ मन की,
कहकर-सुनकर राहत होगी !
नहीं जानता था दुनियां की,
मेरे लिए बगावत होगी !!
प्यार बाँटने बाले घर ,
यह विद्रोही गर्जन कैसा !
प्राण -प्रतिष्ठा के पहले ही,
साकी अरे विसर्जन कैसा !!
दो छन मुझको,मिले उसी की,
याद मुझे क्या जीने देगी !
फिर इस दग्ध-विदग्ध अभागे,
जीवन का बोलो क्या होगा !!

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